खाड़ी की जंग और हमारे खेत: क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों पर मँडरा रहा है खाद का संकट?

दुनिया के एक हिस्से में युद्ध छिड़ा है, लेकिन इसकी तपिश हज़ारों किलोमीटर दूर भारत के खेतों तक पहुँच रही है। ईरान और ओमान के बीच स्थित हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो दुनिया के तेल और गैस का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है, वर्तमान तनाव के कारण बंद हो गया है। यह सुनने में किसी विदेशी समाचार जैसा लग सकता है, लेकिन इसका सीधा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना और गेहूँ उगाने वाले किसानों की जेब पर पड़ने वाला है।



क्यों बढ़ रही है खाद की चिंता?

खेती के लिए नाइट्रोजन आधारित खाद (जैसे यूरिया) बनाने में तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की बड़ी भूमिका होती है। दुनिया की लगभग 20% LNG और तेल की सप्लाई इसी हॉर्मुज रास्ते से होती है। इस रास्ते में रुकावट आने से माल ढुलाई और बीमा का खर्च बढ़ जाता है, जिससे खाद की आपूर्ति में देरी होती है और कीमतें बढ़ने लगती हैं। भारत अपनी खाद और कच्चा माल (जैसे फास्फेट और पोटाश) का लगभग 30-35% हिस्सा इसी समुद्री रास्ते के जरिए मँगाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों पर असर (एक उदाहरण)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जिसे भारत का 'चीनी का कटोरा' कहा जाता है, यहाँ की खेती पूरी तरह से खाद पर निर्भर है। पंजाब के किसान रमेश कुमार की तरह ही पश्चिमी यूपी के मेरठ या बुलंदशहर का एक औसत किसान आज अपनी फसल के गणित को लेकर परेशान है।



उदाहरण के लिए: मेरठ के एक किसान सुरेश को ही लीजिए। वह अपनी अगली फसल के लिए डीएपी (DAP) और यूरिया के दाम बढ़ने की खबर से चिंतित है। सूत्रों के अनुसार, जब खाद महंगी होती है या उसकी कमी होती है, तो किसान अपनी निजी जरूरतों से समझौता करने पर मजबूर हो जाते हैं। सुरेश को अपनी बेटी की शादी के लिए पैसे बचाने हैं और बेटे की स्कूल फीस भी देनी है। अगर खाद के दाम बढ़ते हैं, तो उसे शायद अपनी बेटी की शादी आगे टालनी पड़े या घर के खर्चों में कटौती करनी पड़े।



क्या है सरकार की तैयारी?

हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वस्त किया है कि गर्मियों की बुवाई के लिए खाद का पर्याप्त इंतजाम है। सरकार के अनुसार:

  • खाद के लिए वैकल्पिक देशों से आयात किया जा रहा है।
  • नैनो यूरिया (Nano Urea) और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • पीएम कुसुम योजना के तहत सोलर पंप दिए जा रहे हैं ताकि डीजल पर निर्भरता कम हो।

ज़मीनी हकीकत और चुनौतियाँ

सूत्र बताते हैं कि सरकारी दावों के बावजूद किसानों में घबराहट है। जब खाद महंगी होती है या समय पर नहीं मिलती, तो किसान उसका उपयोग कम कर देते हैं। इसका सीधा असर फसल की पैदावार (Yield) पर पड़ता है। अगर पैदावार कम हुई, तो खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ेंगे, जिससे न केवल किसान बल्कि आम जनता पर भी महंगाई की मार पड़ेगी।



पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए आने वाला समय एक परीक्षा जैसा है। उन्हें न केवल मौसम से लड़ना है, बल्कि हज़ारों मील दूर चल रहे युद्ध के आर्थिक परिणामों का भी सामना करना है। ऐसे में खाद का संतुलित उपयोग और पारंपरिक खाद (जैसे कंपोस्ट और जैविक खाद) की ओर कदम बढ़ाना एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है।

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