मुज़फ्फरनगर, जिसे कभी 'एशिया की क्राइम कैपिटल' के रूप में पहचान मिली, उत्तर प्रदेश के अपराध मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान रखता है। हालांकि, यहाँ के अपराध की प्रकृति पूर्वांचल या बिहार के माफियाराज से काफी भिन्न रही है। जहाँ पूर्वांचल और बिहार में अपराधी अक्सर सीधे तौर पर विधानसभा या लोकसभा तक का सफर तय करते हैं (जैसे मुख्तार अंसारी या शहाबुद्दीन), वहीं मुज़फ्फरनगर में अपराधियों की राजनीतिक पहुँच आमतौर पर 'ब्लॉक प्रमुख' की कुर्सी तक ही सिमट कर रह गई। यहाँ के अपराधियों ने कई बार बड़े चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन मुज़फ्फरनगर की जागरूक जनता और यहाँ की संपन्न कृषि-आधारित पृष्ठभूमि के कारण वे सफल नहीं हो पाए।
| Muzaffarnagar Old and New shiv chowk |
अपराध का आग़ाज़: सफेदपोश संरक्षण और 70 का दशक
मुज़फ्फरनगर में संगठित अपराध की शुरुआत 1975 के आसपास मानी जाती है। हर बड़े अपराधी की तरह, यहाँ भी जुर्म को सियासी संरक्षण मिला। 1973 के दौर में जिले की राजनीति के एक बड़े 'सफेदपोश' नेता (जो चेयरमैन से लेकर राज्य मंत्री तक बने) ने शिव कुमार और राम कुमार नाम के दो सगे भाइयों को संरक्षण दिया। ये दोनों भाई मुज़फ्फरनगर के पहले बड़े डॉन बनकर उभरे। वे एक खुली गाड़ी में चलते थे जिसे 'शांति वाहन' कहा जाता था, जो उस समय के खौफ और विडंबना का प्रतीक था।
इन भाइयों का दबदबा ऐसा था कि पुलिस कप्तान तक से बदसलूकी करना और सरेआम रंगदारी वसूलना इनके लिए आम बात थी। लेकिन, सत्ता और अपराध का गठजोड़ कभी स्थायी नहीं होता। एक अवैध संपत्ति के विवाद में शिव कुमार ने अपने ही संरक्षक मंत्री की बात मानने से इनकार कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने उनका एनकाउंटर करने की रूपरेखा तैयार की। अंततः शिव कुमार की हत्या नफीस नामक व्यक्ति से कराई गई और राम कुमार पुलिस मुठभेड़ में मारा गया।
नफीस कालिया और सुशील मूछ का उदय
शिव-राम भाइयों के अंत के बाद, नफीस कालिया मुज़फ्फरनगर के अपराध जगत का नया चेहरा बना। उसी दौर में जिले के देहात क्षेत्रों से कई नए नाम उभर रहे थे, जिनमें सुशील मूछ, हरपाल खेड़ी, चरण सिंह हैदरनगर और भोपाल रूहाना प्रमुख थे।
वर्ष 1991 में सुशील मूछ ने भोपा रोड पर सुरेंद्र कुकड़ा की सरेआम हत्या कर दी, जिसने उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा नाम बना दिया। इसके बाद नफीस कालिया और सुशील मूछ के बीच एक लंबा और खूनी गैंगवार चला। यह दुश्मनी तब समाप्त हुई जब नफीस कालिया की हरियाणा के कुरुक्षेत्र में गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई। माना जाता है कि इस हत्या के पीछे सुशील मूछ का ही हाथ था, जिसके बाद जिले में उसका एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो गया।
नवनीत सिकेरा: जब अपराधियों में फैला पुलिस का खौफ
मुज़फ्फरनगर के इतिहास में वर्ष 2003 एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जब नवनीत सिकेरा ने जिले के एसएसपी (SSP) का कार्यभार संभाला। एक युवा और तेज-तर्रार अधिकारी के रूप में उन्होंने अपराधियों के खिलाफ कड़ा अभियान छेड़ा। उनके कार्यकाल के दौरान लगभग 55 अपराधियों को मुठभेड़ (एनकाउंटर) में ढेर किया गया, जिससे आम जनता का पुलिस पर विश्वास बहाल हुआ और अपराधियों में दहशत बैठ गई।
विक्की त्यागी और आधुनिक गैंगवार
पुलिसिया कार्रवाई के बावजूद, कुछ नए नाम उभरते रहे, जिनमें विक्की त्यागी सबसे प्रमुख था। त्यागी ने बड़कली गांव में 8 लोगों की सामूहिक हत्या कर जिले को दहला दिया था। विक्की त्यागी इतना बेखौफ था कि उसने जेल के भीतर से अपना साम्राज्य चलाया और एक जेल सिपाही, चुन्नी लाल की हत्या तक करवा दी। हालांकि,
विक्की त्यागी का अंत भी फिल्मी अंदाज में हुआ, जब एक युवक सागर मलिक ने कचहरी परिसर में ही उसकी हत्या कर दी।
वर्तमान स्थिति: बदलता स्वरूप
वर्तमान में मुज़फ्फरनगर में आपसी रंजिश के कारण हत्याएं अब भी एक चुनौती बनी हुई हैं। सुशील मूछ और संजीव जीवा जैसे नाम लंबे समय तक सक्रिय रहे।
(स्त्रोतों से अलग महत्वपूर्ण अपडेट): पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि संजीव जीवा की हाल ही में लखनऊ की एक अदालत में हत्या कर दी गई है, जबकि सुशील मूछ जैसे पुराने अपराधी अब कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर रहे हैं। वर्तमान प्रशासन की सख्ती के कारण अब मुज़फ्फरनगर में संगठित गिरोहों का वह दौर लगभग समाप्त हो चुका है जो 90 के दशक में देखा गया था।
निष्कर्ष
मुज़फ्फरनगर का इतिहास गवाह है कि यहाँ का अपराध अक्सर 'आपसी रंजिश' और 'जमीन के विवादों'
से उपजा है। हालाँकि यहाँ के लोगों की आर्थिक मजबूती और स्वाभिमान ने इसे कभी पूरी तरह 'माफिया राज' में तब्दील नहीं होने दिया, लेकिन गैंगवार के उस दौर ने जिले की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया था।
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