कभी भारतीय मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था।
माना जाता था कि अगर सरकार, प्रशासन या व्यवस्था कहीं ग़लत जा रही है,
तो मीडिया जनता के लिए सच सामने लाएगा।
लेकिन आज वही मीडिया सच से ज़्यादा सनसनी और टीआरपी का खेल बन चुका है।
| भारतीय मीडिया का गिरता हुआ स्तर |
झूठी ख़बरें और सनसनी का खेल
पिछले कुछ सालों में भारतीय मीडिया ने इतनी ग़ैर-जिम्मेदाराना पत्रकारिता की है
कि अब किसी ख़बर पर आँख बंद करके भरोसा करना मुश्किल हो गया है।
अभी हाल ही में सुपरस्टार धर्मेंद्र जी के बारे में कई चैनलों और सोशल मीडिया पेजों ने “मौत की ख़बर” चला दी
वो भी बिना किसी पुष्टि या प्रमाण के।
जब सच्चाई सामने आई कि धर्मेंद्र जी बिल्कुल स्वस्थ हैं,
तो वही चैनल चुप हो गए जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
इसी तरह हाल ही में चला “ऑपरेशन सिंदूर” मीडिया की गिरावट का ताज़ा उदाहरण है।
जहाँ पत्रकारिता के नाम पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने और नफ़रत फैलाने की कोशिश की गई।
सवाल उठता है क्या ये पत्रकारिता है या किसी एजेंडे की स्क्रिप्ट?
अफ़वाहों से भरोसे की हत्या
कई चैनलों ने पाकिस्तान को लेकर “भारत ने कब्ज़ा किया”,
“सीमा पर बड़ी जीत” जैसी बिना पुष्टि की ख़बरें चलाईं,
जिनका न तो कोई सबूत मिला, न आधिकारिक बयान।
ऐसी अफ़वाहें सिर्फ़ दर्शकों की भावनाओं से खेलती हैं,
लेकिन देश की साख़ और पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गहरी चोट छोड़ जाती हैं।
कोरोना काल में मीडिया की शर्मनाक भूमिका
कोरोना महामारी के दौरान, जब पूरे देश को एकता और संयम की ज़रूरत थी,
तब कुछ चैनलों ने तबलीगी जमात को निशाना बनाकर यह झूठ फैलाया कि
“जमाती कोरोना फैला रहे हैं।”
बाद में ये साबित हुआ कि यह खबर पूरी तरह भ्रामक और पक्षपातपूर्ण थी।
लेकिन तब तक मीडिया ने समाज में धर्म के नाम पर दरारें डाल दी थीं।
असली मुद्दे कहाँ ग़ायब हो गए?
आज टीवी खोलिए हर जगह एक ही चीज़ नज़र आती है:
दिनभर की हिंदू-मुस्लिम बहस,
चीख़ते हुए एंकर,
और “देशभक्ति बनाम ग़द्दारी” का नकली ड्रामा।
मज़दूरों की हालत, किसानों की मुश्किलें, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य या महंगाई
ये असल मुद्दे अब टीआरपी के मुकाबले कहीं गुम हो गए हैं।
क्योंकि आज की मीडिया के लिए सच मायने नहीं रखता, सनसनी रखती है।
जनता की ज़िम्मेदारी सच के रखवाले हम ही हैं
मीडिया का स्तर गिरा है, लेकिन इसकी वजह सिर्फ़ चैनल या पत्रकार नहीं हैं —
इसमें हम जनता की भूमिका भी उतनी ही बड़ी है।
क्योंकि आज मीडिया वही दिखा रहा है जो हम देखना चाहते हैं।
हमारी उँगलियों के क्लिक ने पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है।
अब ख़बरें TRP से नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं और ग़ुस्से से चलने लगी हैं।
जो ख़बर उकसाती है, वही वायरल होती है।
जो झूठ भावनाओं को भड़काता है, वही ज़्यादा क्लिक पाता है।
भारत में आज लगभग 70% लोग सोशल मीडिया से ख़बरें लेते हैं,
लेकिन उनमें से ज़्यादातर लोग स्रोत की पुष्टि नहीं करते।
एक वायरल पोस्ट, एक भड़काऊ हेडलाइन या आधे सच पर आधारित वीडियो
इतना ही काफ़ी है किसी भी अफ़वाह को “सच” बनाने के लिए।
हम भूल गए हैं कि पत्रकारिता देखी नहीं, समझी जाती है।
जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है,
तो मीडिया जवाबदेह रहना भी बंद कर देता है।
और जब मीडिया जवाबदेह नहीं रहता,
तो सत्ता और झूठ दोनों बेलगाम हो जाते हैं।
अगर हम हर खबर पर सोचने लगें,
हर सनसनी पर थोड़ी देर ठहर जाएँ,
और हर वायरल पोस्ट से पहले “स्रोत क्या है?” पूछ लें
तो यही छोटा कदम मीडिया को फिर से सच की राह पर ला सकता है।
हम ही वो ताक़त हैं जो मीडिया को गिरा भी सकती है,
और चाहें तो उसे फिर से ऊँचाई पर पहुँचा भी सकती है।
इसके लिए ज़रूरी है कि हम सिर्फ़ दर्शक नहीं, जागरूक नागरिक बनें।
निष्कर्ष
भारतीय मीडिया को अब आत्ममंथन की ज़रूरत है।
पत्रकारिता का असली अर्थ है सत्य की खोज, सत्ता से सवाल, और समाज को जोड़ना।
लेकिन आज मीडिया सच दिखाने के बजाय, झूठ को “मनोरंजन” बनाकर परोस रहा है।
अगर मीडिया अपनी विश्वसनीयता नहीं लौटाता,
तो आने वाले वक़्त में जनता ख़बर नहीं, बल्कि सिर्फ़ राय और अफ़वाहें सुनेगी
और तब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ,
सिर्फ़ एक मंच बनकर रह जाएगा जहाँ सच की नहीं, शोर की गूँज होगी।
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