बहुत-कम लोगों को पता होगा कि किसी एक नाम को दो हजार चार सौ से भी अधिक अलग-अलग अंदाज़ों में लिखा गया है — और यह महान काम किया है उर्दू/अरबी खत्ताती यानी कलिग्राफी के ज़रिए। वो कलिग्राफर हैं गुल आय्युबी साहब।
| मशहूर खत्तात गुल अय्यूबी साहब |
शुरुआती जीवन और प्रेरणा
गुल आय्युबी साहब मूल रूप से Malegaon
(महाराष्ट्र) से हैं।
उनकी प्रेरणा का स्रोत उनके माँ-पिता, उनके धार्मिक और कलात्मक परिवेश तथा प्रमुख रूप से यह था कि उन्होंने न केवल कलिग्राफी को एक कला के रूप में अपनाया, बल्कि इसे एक आध्यात्मिक प्रक्रिया भी माना।
माना जाता है कि २०११ में उनकी माँ के गुजरने के बाद उन्होंने ख़ासतौर पर इस नाम-लिखने की मुहिम को गंभीरता से लिया।
2400 से अधिक अंदाज़ों में नाम लिखने का साहस
गुल आय्युबी साहब ने Muhammad
(ﷺ) का नाम लगभग 2,400 अलग-अलग कलात्मक अंदाज़ों में लिखा है यानी हर एक एकदम नया, अलग डिजाइन, अलग फ्लेयर।
यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि इमां-और-इश्क का परिणाम है — कलम-और-कागज़ द्वारा एक नाम को इत्मीनान से, मुहब्बत से ड्रा करना।
उनकी कलिग्राफी में फॉन्ट-स्टाइल, वज़न, दिशा, शेड्स, लाइन-वर्क सब अलग-अलग दिखते हैं और हर एक अपनी-अपनी पहचान रखता है।
कला-शैली और विशेषताएँ
गुल आय्युबी साहब की कलिग्राफी में आध्यात्मिकता दिखाई देती है — जैसे नाम लिखते समय सिर्फ कलात्मक संतुष्टि नहीं, बल्कि नाम की पैग़ाम-ए-रसलियत का एहसास होता है।
उनका काम सिर्फ “सजावट” नहीं है, बल्कि वो नाम को “रूप हिजा”, “रुप-रेखा” में बदलते हैं — हर एक अंदाज़ में नया ताजगी होता है।
उनकी कलाकृति में अरबी, उर्दू, क्लासिक खत्तात (calligraphy)
के तत्व मिलते हैं — लेकिन आधुनिक संवेदनशीलता भी झलकती है, जिससे युवा पीढ़ी भी आकर्षित होती है।
उन्हें सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम आदि पर भी देखकर-शेयर किया गया है, जहाँ उनके काम की प्रशंसा होती है।
सामाजिक-धार्मिक महत्व
नाम-ए-रसल (हुस्न-ए-ख़त) का ऐसे विविध अंदाज़ों में लिखना, एक तरह से उस नाम-की-शोभा बढ़ाना है — जो मुसलमानों के लिए बेहद पाक और मक़दस है।
गुल आय्युबी साहब की यह उपलब्धि यह संदेश देती है कि कला सिर्फ दिखावे का माध्यम नहीं, बल्कि इबादत-और-इज़हार-ए-मुहब्बत हो सकती है।
इस तरह के कलात्मक प्रयास धर्म-संस्कृति को नए दौर में ले जाते हैं — जहाँ पारंपरिक रूह-का संबंध नए फॉर्म, नए मीडिया के साथ जुड़ता है।
चुनौतियाँ और प्रेरणा
इतने सारे अंदाज़ों में एक नाम लिखना आसान नहीं था — समय, धैर्य, निपुणता,
और लगातार अभ्यास की ज़रूरत थी।
उन्हें अपनी कला-शैली को बनाए रखना था, नए अंदाज़ लाना था, लेकिन नाम-की-हुक्मियत और उस-पर-हुनर का संतुलन भी बनाना था।
उनकी मुहिम से यह प्रेरणा मिलती है कि अगर आप किसी काम को “मक़सद”-साथ करें, तो रुकावटें कम असर करती हैं।
निष्कर्ष
गुल आय्युबी साहब की कलिग्राफी-यात्रा हमें यह सिखाती है कि कला, धर्म और मुहब्बत का मेल क्या ताकत रखता है।
वे सिर्फ एक कलिग्राफर नहीं — बल्कि नाम-ए-रसल की शोभा बढ़ाने वाले कलाकार-है।
हमारी यह अपेक्षा है कि उनकी यह प्रेरणा और उपलब्धि दूसरों को भी “अपने हुनर” को उच्च मकसद के साथ जोड़ने का हौसला दे।
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